बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

मेरे इष्टदेव

पवन पुत्र हनुमानजी तवचरणों मेंशीष
नमारहे यह सर्वदा दो मुझको आशीष
एक तुम्हारी भक्ति ही जीवन का उद्देश्य
पाजाऊं भगवान तो रहे न कुछ भी शेष
मनो कामना भक्त की समझ सकेगा कौन
भक्त शिरोमणि मारुती क्योँ बैठे हो मौन

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