हमारी देह नश्वर है यह सभी जानते हैं। फिर भी उस पर अत्याचार् करने से नहीं चूकते | वरन अज्ञान-वश व्यसनों, व्यंजनों और विचारों के माध्यम से मानो सदैव उससे प्रतिशोध लेने का प्रयास करते रहते हैं। यदि हम इस देह को सहयोग करें, तो निश्चित ही हमारे पूर्वजों व ऋषि मुनियों कि भांति हम भी इसे निरोगी एवं दीर्घ-जीवी बना सकते हैं। बस आवश्यकता है उनके बताये हुए मार्ग का अनुसरण करने की। योगाचरण सर्व श्रेष्ठ मार्ग है।
हे शरीर तुम स्वस्थ रहो
हे शरीर तुम स्वस्थ रहो, मैं तुम्हे सहयोग दूँगा।
योग के हर अंग से, प्रतिदिन तुम्हें पोषित करूँगा।।
यम, नियम को आचरित कर, आसनों को सिद्धकर।
और प्राणायाम से नव-प्राण भरता ही रहूँगा।।
अंतर्मुखी कर इंद्रियों को, प्रत्याहारी मैं बनूँगा।
देह तुमको सुदृढ़ करने के, जतन सब मैं करूँगा।।
किंतु प्रभु में धारणा कर, ध्यान जब करने लगूँगा ।
भूल कर निज भान को, जब मैं समाधि को वरूँगा ।
तब मुझे विचलित न करना, तुम मुझे सहयोग करना।
हे शरीर तुम स्वस्थ रहो, मैं तुम्हें सहयोग दूँगा।।
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